Wednesday, August 10, 2022

कौन आजाद हुआ?: शिक्षा पर एक नजर

आजादी सीरीज: शिक्षा पर एक नजर!

Thursday, July 14, 2022

श्रीलंकाई जनता के जनविरोधी सरकार के खिलाफ संघर्ष के समर्थन में कथन

जनविरोधी सरकार के खिलाफ श्रीलंकाई जनता का संघर्ष जिंदाबाद!
दमन, शोषण और साम्राज्यवाद के खिलाफ हमारी एकजुटता जिंदाबाद!!

समुंदर से घिरा हुआ हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका में लंबे समय से आर्थिक संकट पनप रहा था। आखिर, जनता के सब्र का बांध टूट गया, और श्रीलंका की सड़कों पर व्यापक जन-सैलाब उमड़ पड़ा है, जिसने शासकीय व्यवस्था की वैधता पर ही सवालिया चिन्ह लगा दिया है। बीते दशक से ज्यादा समय से पनप रहे व्यापक आर्थिक संकट के चलते श्रीलंका में इस अभूतपूर्व उथल-पुथल की स्थिति बनी है। अनुमानों के अनुसार, देश की सरकार पूरी तरीके से कर्ज में डूबकर प्रस्त हो चुकी है। हर जगह जरूरी वस्तुओं की भारी कमी है। अर्थव्यवस्था को चलाए रखने के लिए देश को खाद्यान्न, रसोई गैस, अन्य खाद्य पदार्थों, पेट्रोलियम आदि प्रमुख वस्तुओं के आयात करने की जरूरत है, जिसके लिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है। अब तक, श्रीलंका बढ़ते हुए भारी बाहरी कर्ज; पूंजीपतियों और मध्यम वर्गों को दी जाने वाली बड़ी रियायतों के चलते पैदा हुआ भारी राजकोषीय घाटा; पूंजी बाजार से भारी उधार; और बुरी तरह से प्रभावित पर्यटन क्षेत्र तथा अन्य कारणों के चलते विदेशी मुद्रा आय में तेजी से गिरावट जैसी कई आर्थिक समस्याओं का सामना करता आ रहा है। इसके अलावा, किसानों को कोई प्रतिकारी सहायता दिए बिना विदेशी मुद्रा को बचाने के लिए रसायनिक उर्वरकों के उपयोग में कटौती करने के सरकार के फैसले के चलते किसानों की आय और खाद्यान्न का उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है।

इस संकट के गहराने से देश के बड़े शहरों, खासकर राजधानी और सबसे बड़े शहर, कोलंबो की सड़कों पर प्रदर्शनकारियों का सैलाब देखने को मिल रहा है और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने गाले फेस ग्रीन पार्क में एक स्थायी विरोध शिविर स्थापित किया है, जो इन दिनों गोटा-गो-गामा के नाम से जाना जा रहा है। अलग-अलग जगह देश-भर में इस तरह के विरोध शिविरों का निर्माण हो चुका है। ज्ञात हो कि यह पार्क राष्ट्रपति सचिवालय के ठीक सामने है, और यह शिविर सत्ताधारियों के खिलाफ जनता के ताकतवर आंदोलन का प्रतीक है। प्रदर्शनकारियों के साथ सैकड़ों ट्रेड यूनियनों से मजदूर प्रतिनिधि साथ आए हैं और बीते चार दशकों में पहली बार इतनी बड़ी आम हड़ताल देखने को मिली है। यह स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि सत्ता के लिए चल रहे राजनीतिक दलों के म्यूजिकल चेयर को जनता नकारती है, और इसकी जगह एक ठोस निर्णायक बदलाव चाहती है। दरअसल, जनता के विद्रोही रवैये को देखते हुए, आंदोलन को नजरअंदाज करने और फिर बलपूर्वक दमन करने के अपने शुरुआती रुख से सरकार को लगातार पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के आवासों पर कब्जा कर लिया गया है, और राष्ट्रपति को देश से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

जनता की बदहाली के बीच राष्ट्रपति की विलासिता को देखने के लिए प्रदर्शनकारी आम जनता को राष्ट्रपति निवास आने का आमंत्रण दे रहे हैं। राष्ट्रपति निवास का गोर्डन बगीचा परिवारों के लिए एक पिकनिक स्थल बन गया है। अब जनता के कब्जे वाले राष्ट्रपति निवास को देखने आ रही भारी संख्या को संभालने के लिए प्रदर्शनकारियों ने स्वयंसेवकों को संगठित किया है। यह आम जनता द्वारा सत्ताधारियों के उन गतिविधियों को सफलतापूर्वक संचालित करने की क्षमता को दर्शाता है। अमूमन इस तरह के कार्यों को विशिष्ट राजकीय संस्था ही ही कर सकती हैं, यह तर्क देकर शासकीय ताक़त अपने अस्तित्व को जायज ठहराती है। आज नागरिक व्यवस्था बनाए रखने का काम प्रदर्शनकारी कर रहे हैं, और राज्य स्पष्ट रूप से अनुशासन-विहीन दिख रहा है।   

विडंबना यह है कि बीते कुछ दशकों से आर्थिक चमत्कार कहा जाने वाला इस देश की अर्थव्यवस्था अब पूरी तरह से बदहाल हो चुकी है। इस विडंबना का मूल कारण राजनीतिक व्यवस्था का जनविरोधी स्वरूप है, जिसने देश की बहुसंख्यक मेहनतकश जनता के हितों को कुचलते का कार्य किया है। ज्ञात हो कि अंधराष्ट्रवाद, बहुसंख्यवाद और अल्पसंख्यक-विरोधी भावनाओं की लहर पर सवार हो कर कई दशकों से तमाम राजनीतिक दल सत्ता पर कब्जा करते रहे हैं। सत्ताधारी दल मूलतः पूंजीवादी शक्तियों और जमींदारों के गुट हैं। सत्ता पर काबिज होने के लिए, 1970 के दशक में सत्तारूढ़ दलों द्वारा सिंहल-प्रभुत्ववादी राजनीति को सामने लाया गया। इसके बाद जनविरोधी आर्थिक नीतियों को लागू किया गया। उदाहरण के लिए, 1977 में सरकार ने बड़े नाटकीय तरीके से मूल्य नियंत्रण, टैरिफ और अन्य विनियमन क़ानूनों को धीरे-धीरे निष्प्रभावी कर दिया और अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी को निवेश के लिए आमंत्रित करना शुरू किया। नतीजतन, विदेशी कर्ज बड़े पैमाने पर बढ़ता गया। इन नीतियों के खिलाफ उठे जन-आंदोलनों को कुचलना को एक चलन बना दिया गया। ट्रेड यूनियनों पर अंकुश लगाया गया, और मेहनतकश जनता को सक्रिय रूप से जातीय, भाषाई और धार्मिक आधार पर विभाजित किया गया। घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को टैक्स में व्यापक छूट दी गई, और टैरिफ-मुक्त आयात इस उभरते आर्थिक परिदृश्य की विशेषता थी। इससे विदेशी कर्ज पर निर्भरता बढ़ गई, जिससे मौजूदा आर्थिक संकट की नींव पड़ी।

2000 के दशक से सुगबुगाते इस संकट के बीच सरकारें सिंहाला प्रभुत्ववाद को बढ़ावा देने के साथ-साथ दमनकारी नीतियाँ अपनाती रही हैं। सत्ता पर काबिज, मौजूदा राजपक्षे परिवार, ने 2000 के दशक के शुरुआती दौर से सत्ता को हथियाया, और तमिल मुक्ति आंदोलन को पूरी तरह से कुचलने का काम किया। इससे तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की लोकप्रियता बढ़ी, और मेहनतकश जनता की एकजुटता में कमी आई। वहीं आर्थिक मोर्चे पर विदेशी कर्ज लगातार बढ़ता गया, ऊँचे ब्याज दर लगाए गए और कर्ज-वापसी की अवधि कम हुई। बढ़ते हुए कर्ज के बावजूद, विदेशी और निजी निवेशों को आकर्षित करने के लिए सरकार ने रियायती दरों में पूंजीपतियों को कर्ज देने जैसी अपनी अमीर-हितैषी नीतियों को जारी रखा, जबकि इसी बीच मेहनतकश जनता मूलभूत वस्तुओं की भारी कमी से जूझ रही थी। इसी बीच सेना पर हुआ खर्च भी चौंकाने वाला है। मेहनतकश जनता की परेशानियों के बीच देश के बजट का 12.3% सेना के लिए आवंटित किया गया।

इसीलिए, मौजूदा संकट ने सत्ताधारी अभिजात वर्ग के लिए जन-स्वीकारोक्ति का संकट पैदा कर दिया है। हालिया जन-विरोध सिर्फ चंद लोगों के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा हुआ है। लोगों को बाँटने की सत्ताधारी दलों की नीतियाँ पूरी तरह से नाकामयाब हुई हैं, और अब तक प्रतिबंधित जन-ताकतों को नई जान मिली है। रिपोर्ट बताते हैं कि गोटा-गो-गामा में सिंहाला और तमिलों ने साथ मिलकर श्रीलंकाई नववर्ष मनाया। आंदोलन को रोकने के लिए सरकारों द्वारा जनता को डराने की कोशिश की गई, और उन्हें गिरफ्तार करने, मारने या डराने के लिए हिंसा का इस्तेमाल किया गया। परंतु सरकार की दहशत फैलाने वाली साजिशें लगातार नाकाम हो रही हैं, और सरकार की हर हिंसात्मक कार्रवाई को जनता के भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है, और लोग राजनेताओं के घरों-ऑफिसों को जलाकर, तथा उन्हें कब्जे में लेकर राजशाही के खिलाफ प्रतिशोध ले रहे हैं। साथ ही, जनता में सांप्रदायिक कलह को भड़काने की राज्य-प्रायोजित अफवाहों को जनता ने नाकाम कर दिया है। राजशाही द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों को झूठा साबित करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से प्रदर्शनकारियों ने इंटरनेट पर लाइव-स्ट्रीमिंग कर विभिन्न समुदायों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द को जनता के सामने प्रदर्शित किया। विभिन्न धार्मिक समूहों ने सामूहिक रूप से रमजान मनाया, जिससे मेहनतकश लोगों के बीच एकजुटता दिखाई दी। ज्ञात हो कि श्रीलंका के दक्षिण क्षेत्र में लोग पहली बार गृहयुद्ध में मारे गए तमिलों के लिए शोक मनाने के लिए निकले हैं। सांप्रदायिक फूट डालने की कोशिशों के बीच यह एकजुटता प्रशंसनीय है और मौजूदा आंदोलन की सफलता का मजबूत आधार बनी है।

वर्ष 2010 के बाद से श्रीलंका सरकार के ऋण-बनाम-जीडीपी अनुपात में लगातार बढ़ोतरी हुई है। स्रोत: सेंट्रल बैंक ऑफ श्रीलंका, 2021

            मुख्य रूप से प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग की है। परंतु, मेहनतकश जनता के जीवन और जीविका से जुड़े ठोस मुद्दे और इस मौजूदा राजनीतिक संघर्ष की कई महत्वपूर्ण माँगें या तो व्यवस्थित तरीके से उठाए नहीं गए हैं, या फिर उन्हें जानबूझकर मुख्यधारा की चर्चा से बाहर कर दिया गया है। ऐसी स्थिति में, और खासकर जब व्यवस्था परिवर्तन का संघर्ष चल रहा है, तब लंबे समय से राजनीति में मौजूद तमाम धूर्त नेता जनता की संवेदनाओं का इस्तेमाल कर सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं। इसका स्पष्ट उदाहरण पूर्व राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना हैं। सरकार को हटाने की बढ़ती माँगों के बीच उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार नहीं बनी रहनी चाहिए। हालांकि, यह बात ध्यान देने वाली है कि यह वही व्यक्ति था जिसने कार्यकारी और पूर्व प्रधानमंत्रियों को नियुक्त किया था। साथ ही, यह साफ तौर पर दर्शाता है कि सत्तारूढ़ और विपक्षी दल एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं और दोनों में कोई व्यापक विचारधारात्मक अंतर नहीं है। दोनों ही मौजूदा भ्रष्ट और शोषणकारी व्यवस्था को जारी रखना चाहते हैं, जिसने देश की मेहनतकश जनता के साथ विश्वासघात किया है। किसी भी तरीके से दाँव-पेंच से बनाई गयी सरकार और वर्तमान शासकीय व्यवस्था को बनाए रखने की कारस्तानी खुल्लम-खुल्लम मौजूदा जन-आकांक्षाओं के खिलाफ साबित होगी।

प्रदर्शनकारियों का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के आवासों पर कब्जा है, लेकिन प्रभुत्वशाली आर्थिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले सत्ताधारी नेताओं ने जनता के खिलाफ षड्यंत्र करना शुरू कर दिया है। पूँजीपतियों के दलाल सत्ताधारी अभिजात किसी भी तरीके से जोड़-तोड़ से मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को कायम रखना चाहते हैं। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से संपर्क किया जा रहा है, तथा इस साम्राज्यवादी एजेंसी और संकटग्रस्त देश के बीच एक सौदा होने की संभावना है। आईएमएफ विभिन्न कठोर प्रतिबंधों और शर्तों के साथ सहायता राशि देने के लिए कुख्यात है, जिससे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पूंजीपति तो समृद्ध होते हैं, परंतु जनता गरीबी के दलदल में फंस जाती है।

आज समय की ज़रूरत है मौजूदा सरकार को केवल सत्ता से न केवल बेदखल किया जाए, बल्कि जन-आंदोलन को एक मुकम्मल अंजाम दिया जाए। देश में केवल शासकों और सत्ताधारी दलों के बदलने की जगह ज़रूरत है कि राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में मूलभूत बदलाव लाया जाए। चाहे कार्यकारी राष्ट्रपतीय प्रणाली (executive presidency) हो या सुगम संसदीय प्रणाली हो, दोनों से परे जाने की जरूरत है। इस संबंध में, आज स्पष्ट जनमत दिख रहा है, और जनता के बीच में एक नई सामाजिक चेतना ने जन्म लिया है। राष्ट्रपति को विशेषाधिकर देने वाली कार्यकारी राष्ट्रपतीय प्रणाली को समाप्त करने के लिए जनता ने आह्वान किया है। बीते दशकों में, मेहनतकश जनता के आंदोलनों को कुचलने, जातीय-धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताने, अंध-राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने और जनता को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने के लिए इन विशेषाधिकारों का इस्तेमाल किया गया है। हालाँकि, ऐसी शक्तियों और ऐसी व्यवस्था की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। जनता के आंदोलन का एक व्यापक फैलाव है, और जन-आकांक्षाएँ सिर्फ और सिर्फ संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन से ही पूरी हो सकती हैं।

अर्थव्यवस्था केवल कुछ घरेलू और विदेशी पूंजीपतियों के लिए नहीं चलाई जानी चाहिए। श्रीलंका में विशाल चाय बागान और चाय कंपनियां हैं, जिनमें मेहनतकश आबादी का एक बड़ा हिस्सा काम करता है। बड़े औद्योगिक उद्यमों के साथ इनका राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिए, और इस क्षेत्र में मौजूद विशाल धन और मुनाफे का उपयोग आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए किया जाना चाहिए। इसके अलावा, सभी आवश्यक वस्तुओं को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की सहायता से वितरित किया जाना चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का प्रबंधन जन-समितियों द्वारा किया जाना चाहिए, और इनमें निजीकरण को खत्म करके, पूरी तरह से सार्वजनिक रूप से वित्त-पोषित किया जाना चाहिए। साथ ही, अन्य सभी छोटी-छोटी आर्थिक गतिविधियों के लिए सहकारी समितियों का गठन और प्रसार किया जाना चाहिए।

श्रीलंका में वर्तमान समय बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोग इतिहास रचने की कगार पर खड़े हैं। अभी जब लोगों के हाथों में इतिहास की कमान है, तो हर पांच साल में केवल एक बार अपनी राय रखने के रस्म-अदायगी को समाप्त किया जाना चाहिए। जनता के इस आंदोलन को राष्ट्रपति के विशेषाधिकार और सरकार बदलने की कवायद के साथ ही पीछे नहीं हटना चाहिए, जिससे संसद के 225 सदस्यों के हाथ में सत्ता फिर से निहित हो जाए। इतिहास उन्हें वर्तमान से परे जाकर एक नई प्रणाली विकसित करने और श्रीलंका में जन-संसदों की स्थापना करके लोगों की प्रत्यक्ष भागीदारी को संस्थागत बनाने का आह्वान कर रहा है। शहरों, कस्बों और गांवों में जन-संसदों को देश के जरूरी मुद्दों पर निर्णय लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, उनके हाथों सर्वोच्च शक्ति होनी चाहिए, और संसद देश के मामलों का प्रबंधन करने वाला केवल एक प्रतिनिधि निकाय होना चाहिए। जन-संसदों के पास संसद के अपने प्रतिनिधि को बुलाने और हटाने का अधिकार होना चाहिए। साथ ही, यदि देश के बहुसंख्यक जन-संसद कोई निर्णय लेते हैं, तो उनके पास देश का कानून बनाने या निरस्त करने का अधिकार होना चाहिए।

देश को कमजोर करने के उद्देश्य से आईएमएफ और अन्य अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी कर्जदाता एजेंसियों द्वारा दिये गये कर्ज को रद्द कर दिया जाना चाहिए। यह मालूम होना चाहिए कि आईएमफ देश के आम लोगों को आर्थिक बदहाली से बचाने के लिए नहीं सहायता दे रहा है, बल्कि उसकी पूरी मशक्कत है कि सत्तारूढ़ अभिजातों के हित में मौजूदा राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था कायम रहे।

जनता ने अपनी सामूहिक शक्ति का ज़बरदस्त परिचय दिया है, जिसने राजशाही पर काबिज प्रभुत्वशाली आर्थिक वर्गों की पकड़ को कमजोर कर दिया है, और इससे तमाम जन-विरोधी ताकतों को जोर का झटका लगा है। मौजूदा सरकार के गिरने के बाद लोगों को पीछे नहीं हटना चाहिए, बल्कि प्रभावी ढंग से खुद को सशक्त बनाने के तरीकों को विकसित करना चाहिए। यह जरूरी है कि आंदोलन का उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि इस व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन लाना हो। इस संबंध में, ज्ञात हो कि लोगों ने न केवल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग की है, बल्कि मौजूदा विपक्षी दलों के सदस्यों सहित सभी संसद सदस्यों के इस्तीफे की भी मांग की है, जो हर संभव प्रयास कर रहे हैं कि किसी तरह सरकार बनाने के लिए सर्वदलीय गठबंधन बनाएं या व्यवस्था को बचाने के लिए नए राष्ट्रपति का चुनाव करें। महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे सभी प्रस्ताव निरर्थक साबित हो रहे हैं। यहां तक कि संकटों से घिरे प्रधानमंत्री द्वारा विरोध कर रहे युवाओं से संसदीय समितियों में अपने प्रतिनिधियों को नामित करने की  अपील को भी सिरे से खारिज कर दिया गया है। यह श्रीलंका में मौजूदा राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के प्रति जनता में मौजूद व्यापक अविश्वास को दिखाता है। आने वाला भविष्य यह टकटकी लगाए देख रहा है कि इस जनांदोलन में मौजूद जागरूक अगुवा हिस्सा कैसे इस व्यापक उथल-पुथल को एक सफल क्रांतिकारी परिवर्तन में बदलता है।

श्रीलंका में जो हो रहा है, वह दुनिया भर की जनता की आकांक्षाओं का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह आश्चर्यजनक नहीं है कि मुख्यधारा की मीडिया ने दुनिया भर के विभिन्न देशों में सत्ताधारी आभिजात्यों और प्रभावशाली आर्थिक वर्गों के इशारे पर श्रीलंका के घटनाक्रम को प्रभावी ढंग से प्रसारित करने से रोका है। हालांकि, दुनिया भर की संघर्षरत प्रगतिशील ताकतों की निगाहें श्रीलंका के संघर्ष को देख रही हैं ताकि यह आंकलन किया जा सके कि इस संघर्ष का परिणाम एक फौरी विद्रोह होगा या यह एक ऐतिहासिक क्रांति का रूप लेगा। मौजूदा आंदोलन एक निर्णायक मोड़ पर है, और मौजूदा आंदोलन के अव्यक्त लेकिन उफान-मारते  व्यवस्था-विरोधी रूख को एक ठोस दिशा देना जागरूक ताकतों की ऐतिहासिक भूमिका बनती है। दुनिया भर के देशों में मौजूद आर्थिक संकट और व्यापक अनिश्चितताओं को देखते हुए, आने वाले दिनों में श्रीलंका के इस आंदोलन का भविष्य दुनिया भर के जन-आंदोलनों पर भी असर डालेगा।

आज समय की मांग है कि सभी देशों की मेहनतकश जनता श्रीलंकाई जनता के संघर्षों के साथ खड़े होने और श्रीलंका की जनता की मांगों को समर्थन देने के लिए अपनी-अपनी सरकारों पर दबाव डाले, ताकि मौजूदा व्यवस्था में आए मुकम्मल बदलाव में जनता की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो सके। श्रीलंका में वर्तमान आंदोलन के प्रति एकजुटता दिखाने का एक तरीका अपने देश में आंदोलनों का निर्माण करना है। इस तरह के आंदोलनों की एकजुट शक्ति ही दुनिया भर में राजनीतिक और आर्थिक प्रणालियों में जनता की शक्ति के संस्थागतीकरण को सुनिश्चित करेगी।

जब-जब जनता एकजुट हुई है, जनता की जीत हुई है!      श्रीलंकाई जन आंदोलन जिंदाबाद! इंकलाब ज़िंदाबाद!

- क्रांतिकारी युवा संगठन (KYS) द्वारा दिनांक 12 जुलाई 2022 को जारी 


Tuesday, July 12, 2022

In support of People's Struggle in Sri Lanka against Anti-People Government.

Long Live Sri Lankan People's Struggle against Anti-People Government!
Long Live Our Solidarity against Oppression, Exploitation and Imperialism!!


The neighbouring island country has been facing a mass upheaval which has brought a sea of people onto the streets and created a legitimacy crisis for the ruling power. The background of this unprecedented situation in Sri Lanka is a severe economic crisis that has been brewing and maturing since at least a decade. As per estimates, the country has defaulted on sovereign debt, and everywhere there is an acute shortage of staple items. The country needs large amounts of foreign currency for it to import staple items such as food grains, cooking gas, other edibles, petroleum, etc. in order to keep the economy running. As of now, the country faces a multitude of economic problems, such as the massive build-up of external debt; the huge concessions given to the capitalists and middle-classes which have increased the fiscal deficit; massive borrowing from capital markets; and the huge decline in foreign exchange earnings because of a badly-hit tourism sector among other factors. Further, the ill-considered decision of the government to cut down on the use of chemical fertilizers to save foreign exchange without actually providing any remedial support to the farmers has in turn hit farmers’ incomes and the food grain output.
The build-up of problems has been such that massive protests have arisen on the streets of the major cities, especially the capital and largest city, Colombo. The protesters have established a permanent protest camp at the Galle Face Greene park; now popularly being referred to as GotaGoGama. It is noteworthy that this park is located right opposite to the President’s Secretariat, symbolizing the powerful movement of the people right next to the seat of power. The assembled people have been joined by workers’ delegates from hundreds of trade unions, and a general strike has been reported for the first time in four decades. It shows that the people do not just want to play the game of musical chairs, i.e., watching to see which political grouping occupies the seat of power, but rather they want more concrete change. In fact, the popular mood is such that the government has had to steadily backtrack from its initial stance of ignoring and then repressing the movement. The President and the Prime Minister’s residences have been occupied, and the regime has been completely discredited as huge wads of currency notes have been unearthed at the President’s residence, even as the general working population faces acute financial woes.


The protesters are inviting people to visit the Presidential Residence to observe the luxuries enjoyed by the President amidst widespread misery. The Gordon Gardens within the Presidential Residence has become a picnic spot for families. Protesters have organised volunteer troops to handle the large number of visitors to the now publicly-occupied Presidential Residence. It shows the resilience of common people to undertake those activities which authoritarian states use as the legitimate reason for their existence.

It is ironic that the island country which was since a few decades being termed an economic miracle, has completely collapsed. The irony lies in the nature of the political system which has served to completely subjugate the interests of a vast majority of labouring people of the country. It should be noted that the ruling parties, riding on the wave of jingoism, majoritarianism and anti-minority sentiments, have been capturing power for many decades. The ruling parties are basically cliques of landed and capitalist powers. In order to hold onto power, the now dominant Sinhala-majoritarianism was unleashed in the 1970s by the ruling parties. This political development was followed by enactment of anti-people economic measures. The government in 1977, for example, dramatically reduced or abolished price controls, tariffs and other regulations, and invited foreign capital to invest in the economy. As a result, foreign debt increased massively. The people’s movements against these policies were crushed. The trade unions were curbed, and the working masses were actively divided on ethnic, linguistic and religious lines. Generous tax holidays were granted to domestic and international companies, and tariff-free imports of inputs characterised the emerging economic scene. This led to increasing reliance on foreign debt, laying the basis for the current economic crisis. 

The crisis which has been brewing since the 2000s has been accompanied by the regime using majoritarian sentiments on the one hand, and resorting to repressive measures on the other. The current ruling family, the Rajapaksas, came into power in the early 2000s, and completely crushed the Tamil liberation movement by launching a civil war. This proved to buoy up the then President, Mahinda Rajapaksa’s popularity, while weakening solidarity among the labouring masses. However, on the economic front, the foreign debt continued to rise, with higher interest rates being imposed and shorter return period of loans. Despite growing debt, the government continued with its pro-rich policies such as continuing to grant tax concessions to the rich – ostensibly for attracting investment – while the working masses faced shortages of staple items. The expenditure on the army is also staggering, with 12.3% of the entire budget being allocated for the military in 2022, even as the working masses face severe shortage of almost everything. 

Since 2010 Sri Lankan government Debt-to-GDP ratio gradually increased. Source: Central Bank of Sri Lanka, 2021.

Thus, this unprecedented crisis has created a crisis of legitimacy for the ruling elites now. Protests have erupted not just against certain individuals, but against the system itself. The earlier policies of the ruling parties to divide people have received a jolt in recent months, and the hitherto curbed popular forces have found a new awakening. As per reports, at GotaGoGama, Sinhalese and Tamils have reportedly celebrated the Sri Lankan New Year together. In order to curb the people’s movement, the state has tried to criminally intimidate people and has used violence to arrest, kill or scare them away. However, these terror-tactics are proving unsuccessful, and with every act of violence, the people have organized brutal reprisals on the state machinery by burning, occupying or ransacking politicians’ homes and offices. Also, the state-sponsored rumours to stoke communal dissension among the masses have been repudiated by the people themselves. They have done live-streaming from different locations across the country to falsify the rumour being spread by the state apparatus, and to show communal harmony among different communities. Various religious groups have collectively observed breaking of fasts during Ramadan, thereby showing solidarity among the working people. It has also been noted that in the south, people have turned out for the very first time to mourn the Tamils killed in the civil war. This solidarity, even amidst attempts to stoke communal divisions is laudable, and forms the basis for the success of the present movement.

The main demands of the protesters have been to demand the resignation of the President and the Prime Minister. The various other demands which propelled the current political crisis have largely remained inchoate, or, have been deliberately pushed out of the mainstream, such as the concrete demands related to the living and working conditions of the labouring masses. In such a situation, and especially when a sweeping change in the system is required, there are of course sly politicians waiting in the wings, who despite being present for substantial periods of time in the politics of the country, have till now remained complacent and are now opportunistically riding on the wave of popular sentiment. An apt example is the former President, Maithripala Sirisena. With the growing demand for the ouster of the government, he has also voiced his opinion that the present government should not continue. However, one needs to only see his dubious credentials as the person to appoint both the incumbent and the former Prime Ministers, to realise that the clique of opposition and the ruling parties are ideologically bankrupt. Both opposition and ruling parties wish to simply continue with the current corrupt system which has betrayed the labouring masses of the country. This would only prove absolutely antithetical to the popular aspirations against the current system in Sri Lanka.

Even as the protesters continue to occupy the premises of the President’s and the Prime Minister’s residences, the ruling elites representing the dominant economic classes, both domestic and international, have begun to muster forces. The President, though unable to govern, is defiant and is keen on continuing in power, even as he vainly offers to resign. Despite widespread misery, the ruling elites are keen on continuing as before, with or without the present government. Thus, the International Monetary Fund (IMF) has been contacted, and there is likely to be a deal between the imperialist agency and the crisis-torn country. The IMF is infamous for offering assistance funds armed with various austerity measures which would only impoverish the masses while enriching the domestic and international capitalists.

The need of the hour is to not just oust the present government, but to strengthen the powerful people’s movement further. There is a need for a change in the politico-economic system of the country, not just a change of rulers and ruling parties. Whether executive presidency or parliamentary power, the need is to go beyond both. In this regard, the popular mood has already moved, and a new social consciousness has taken birth. There have been calls for the abolition of executive presidency which gives the President enormous sweeping powers. In the past decades, such powers have been used to crush the labouring people’s movements, persecute the ethno-religious minorities, bolster jingoism, and deprive the masses of their democratic rights. However, the death knell of such powers and such systems has sounded. The people’s movement holds sway, and their aspirations can only be fulfilled with the complete change in the system.

The economy should not be run for the few capitalists, both domestic and foreign. Sri Lanka has vast plantations and tea companies wherein a large section of labouring population works. These, along with the large industrial enterprises, should be nationalised, and the vast wealth and profits of these should be used to purchase essential imports. Moreover, all the essential items should be distributed through Public Distribution System (PDS), education and healthcare should be managed by people’s committees, and should be completely publicly-funded. Also, for all other small economic activities, cooperatives should be formed and promoted.

The present moment in Sri Lanka is important as the people have occupied the centre stage of history. Now that the people have taken the centre stage, the ritual of voicing one’s opinion only once in every five years should be ended. The people’s movement must not retreat with a change in the government and vest power yet again in the 225 members of parliament, thereby giving back authority to them. The history calls upon them to go beyond the present, evolve a new system and institutionalize direct power of the people by establishing people’s assemblies across Sri Lanka. The people’s assemblies in the cities, towns and villages should be empowered to decide upon the most pressing issues in the country. Moreover, their power should be supreme, and the parliament should only be a representative body to manage the affairs of the country. The people’s assemblies should have the powers to summon and suspend their representatives in Parliament. Also, they should have the power to make or repeal laws by the criterion of a majority of assemblies in the country deciding to do so.

The loans by IMF and other international lenders which are aimed to hold the country to ransom should be repudiated. IMF, it should be noted, is not making a deal with the ruling elites to rescue the country. Instead, it seeks to arrest people’s aspirations so that they do not destroy the present politico-economic system.

The people in the present conjuncture have shown their collective power, which has shattered the hold of dominant economic classes over the state machinery, and has sent shock waves among the elites of different hues. The people should not withdraw after the present government is toppled, but should effectively evolve ways to empower themselves. It is imperative that the movement does not simply aim to change the government but that it brings about a fundamental change in the system itself. In this regard, it is noteworthy that the people have not just demanded that the President and the Prime Minister should resign, but have demanded the resignation of all the Parliament members, including the members of the current opposition parties which are making all-out attempts to somehow stitch an All-Party alliance to form a government or re-elect a new President to save the system. Importantly, all such overtures are proving futile. Even the appeals by the embattled Prime Minister to the protesting youth to nominate delegates to sit in Parliamentary Committees have been outrightly rejected.

This also shows latent distrust for current political and economic systems in Sri Lanka, and symbolizes a radicalised people’s movement at the verge of bringing about revolutionary transformation. It has to be seen whether the conscious advance forces within the movement manage to catapult this unprecedented crisis and mass upheaval towards revolutionary transformation. 

What is happening in Sri Lanka also represents the aspirations of the masses across the world. Not surprisingly then, the mainstream media has effectively blacked out the developments in Sri Lanka at the behest of ruling elites and dominant economic classes in various countries across the world. However, the struggle in Sri Lanka is being actively followed by the struggling progressive forces across the world in order to assess whether the potential trajectory of the struggle would be that of a fleeting rebellion or it would culminate into a historic revolution. The movement is at a crossroads, and it is the historic task of advanced conscious forces to give a tangible and concrete form to the latent yet palpable anti-systemic tendencies in the present movement. The unfolding developments would also affect the people’s movements across the world, given that similar economic crises and widespread precarity are also prevailing in all countries.

The moment beckons the toiling masses of all countries to extend their solidarity to the Sri Lankan people, and pressurize their respective governments to support the demands of the Sri Lankan people that any change in the prevailing setup must be made with the active participation of all people. One way to extend solidarity to the present movement in Sri Lanka is to build movements in one’s own country. The gathering momentum of such movements would ensure the actualisation and institutionalisation of people’s power in the political and economic systems across the world.

The People United Shall Always be Victorious!

Victory to the Sri Lankan People’s Movement!!

- Released by Krantikari Yuva Sangathan (KYS) 

Thursday, May 20, 2021

"जन-स्वास्थ्य अधिकार अभियान"

CAMPAIGN FOR PEOPLE’S HEALTH RIGHTS

Monday, November 16, 2020

Know Everything about Migration from SOL to Regular College | (Hindi)